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जड़, जंगल और जमीन: गांवों से गुम हो रही बांस की खेती, अब संग्रहालयों में दिखेंगी बांस की लाठी, पालकी, चारपाई

बांस एक सामान्य पेड़ नहीं है, यह पूज्य वृक्ष है। इसकी डोली पालकी पर बैठकर हमारे घर में लक्ष्मी आई हैं, जननी आई हैं, मां आई हैं। भारत में प्राचीन काल से कई प्रकार की युद्ध कलाएं प्रचलित हैं। पुराने जमाने का सबसे प्रमुख अस्त्र बांस से बनी लाठी ही थी।

आत्म रक्षा से लेकर शासन चलाने तक जिस लाठी की जरूरत सदियों से पड़ती रही है, वह जिस बांस से बनती है, उसका अस्तित्व ही अब खत्म हो रहा है। बांस का पेड़ बहुत महत्वपूर्ण है। गांव में परंपरागत मकान बनाने, बैठने के लिए मचिया, लेटने के लिए चारपाई, दुल्हन को लाने के लिए पालकी, घरों और खेतों की सुरक्षा के लिए घेराबंदी करने और जीवन की अंतिम यात्रा में निकलने के लिए सिंहासन (अर्थी) का निर्माण बांस से ही किया जाता रहा है। पर्यावरण के लिहाज से बांस की खेती बहुत अच्छी मानी जाती है। बांस की खेती बंद होना जड़, जंगल और जमीन पर बढ़ते संकट का एक और प्रतीक है। इसको नहीं बचाया गया तो प्रकृति से हम और दूर हो जाएंगे।

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